योजनाबद्ध रहे
,अनुशासित रहे |
मै क्या होना/बनना
चाहता हूँ ? मै उसके लिए क्या योजना बना रहा हूँ ? अभी तक मैंने अपने लक्ष्य की और
कितने कदम बढ़ाये है ? क्या मेरे लक्ष्य के प्रति मै पूरी तरह समर्पित हूँ ? क्या
असफलताओं को लेकर मै भयभीत हूँ ? क्या मुझे दूसरों की सफलता से बल मिलता है या
ईर्ष्या होती है ?
इन प्रश्नों को अपने
जीवन में हर हफ्ते अपने सामने लिखकर देखिये और मन ही मन स्वयं को इनके उत्तर देने
का प्रयास कीजिये | शायद आपके जीवन की कई बाधाएं जो आपने स्वयं अपने इर्द गिर्द बन
रखी है उनका समाधान आप स्वयम कर सके | एक बात को जरूर अपना मापदंड बना कर रखे कि
इन सभी प्रश्नों के उत्तर देते हुए आप का लाभ किस्मे निहित है | जैसे किसी कि
सफलता को देखकर यदि आप प्रेरणा ले रहे हैं या कोई बल महसूस कर रहे है तो वाकई आपका
लाभ हो रहा है | पर यदि आप सफल होने वाले व्यक्ति से ईर्ष्या कर रहे है तो ये बहुत
ही आत्मघाती है |इस से न केवल आपका मानसिक संतुलन बिगड़ता है बल्कि आप की ऊर्जा भी
व्यर्थ होती है यही नहीं शारीरिक तौर पर भी आप अपने आप को कोई नुक्सान पहुंचा सकते
है | किसी से ईर्ष्या करना नाकारात्मक विचारों को अपने मस्तिष्क में लाने जैसा है
| जहाँ नकारात्मकता आई वहीं आप अपने लक्ष्य से न केवल भटक जाते है बल्कि अपने इर्द
गिर्द के माहौल को भी अशांत कर देते है | आपकी हालत एक चोट खाए सांप जैसी हो जाती
है | आप लगभग अनुशासन के दायरे से बाहर चले जाते है | क्या आप अनुशासन में रहने के
बजाय अफ़सोस के चक्रव्यूह में फसना चाहेंगे ?
अभी कल मेरे एक
मित्र मुझे एक पार्टी में मिले | बहुत ही खुशनुमा माहौल में वे पार्टी को इंजॉय कर
रहे थे कि अचानक वह पर एक और व्यक्ति दाखिल हुआ और मेरे मित्र की पूरी मनोस्थिति ही बदल गयी |
उसका हँसता हुआ चेहरा मुरझा गया | वो हँसता हुआ एकदम शांत हो गया और उसके माथे पर
सिकुडन छा गयी | उसने अचानक उस व्यक्ति के बारे में मुझसे कुछ नाकारात्मक बाते
कहनी शुरू कर दी | वो आदमी हमसे बहुत दूर
खड़ा लोगो से मिल रहा था और मुस्कुरा रहा था | मेरे मित्र की नाकारात्म्कता का उस
पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था | हाँ मेरे
मित्र का रक्तचाप और मनोस्थिति जरूर बिगड़ गयी थी | कोई कारण था कि वो उसे ईर्ष्या करता होगा पर
इसका उसे क्या लाभ हुआ ,मुझे उस शानदार पार्टी में समझ नहीं आया | मै उसे उस जगह
से दूर एक हाल कमरे में ले गया जहा मेरे मित्र को अपना वो प्रतिद्वंदी (बिना मतलब
) दिखाई देना बंद हो गया तो वो कुछ सहज हो गया | मैंने पहला प्रश्न उसे यही किया
कि इस शानदार पार्टी का मजा लेने के बजाय वो उस आदमी के बारे में सोचकर अपना मजा
खराब क्यों कर रहा है ? क्या उस व्यक्ति ने उसे भी देखकर ऐसा किया ?
ईर्ष्या या जलन का तत्व हमें विनाश की और ले जाता है |
इसलिए अपने समय और दिमाग की ऊर्जा का प्रयोग इस नाकारात्मक तत्व के लिए न करे | ये
आपकी एकाग्रता और लक्ष्य प्राप्ति में सबसे बड़ा भटकाव पैदा कर सकता है | यदि आप
अपनी मनोस्थिति को लेकर चेतन है ,सचेत है तो आपकी सफलता निश्चित है | ईर्ष्या की
जगह प्रेरणा ले और इसे अपनी कमजोरी बनने के बजाय अपनी ताकत बनाये |
मैंने देखा है कि
लोग समाचार पत्रों या टेलीविजन पर नकारात्मक समाचारों से प्रभावित होते रहते है और
उन लोगो को लेकर बहस करते है या परेशान होते है जिनका उनके जीवन या कार्यक्षेत्र
से कोई लेना देना नहीं होता | पर यह गुण सफल व्यक्तियों में नहीं देखा गया ,वे
केवल उन बातों पर ध्यान देते है जिनका प्रभाव उनके कार्य क्षेत्र पर हो सकता है |
व्यापारी कारोबार और व्यापार से जुडी बातों पर ज्यादा ध्यान देता है | स्टॉक
ब्रोकर शेयर बाजार के चढ़ते गिरते भावों पर ध्यान देता है | खिलाडी खेल से सम्बंधित
समाचारों पर ध्यान देते है | ऐसा इसलिए होता है क्योकि वो अपने कार्यक्षेत्र को
लेकर अनुशासित रहते है | उन्हें अपने कार्यक्षेत्र के लिए इससे ऊर्जा और राय बनाने
में मदद मिलती है | बाकी जो लोग है मै उन पर यहाँ कोई टिप्पणी नही करूँगा हमारे
देश के बड़े उद्यमी श्री रत्न टाटा कहते है कि मै जब कोई निर्णय लेता हूँ तो उसके
बाद मेरा एक ही लक्ष्य होता है कि उसे सही साबित करना है | वकालत के क्षेत्र में
भी क्या हमारे माननीय वकील इसी सूत्र पर काम नहीं करते | बिलकुल करते है | हमें भी
अपने लक्ष्यों या निर्णयों को सफलता तक ले जाने के लिए इस गुण को अपनाना होगा और
इस मामले में किसी भी नैतिक मूल्य को ठेस न पहुंचे इस बात का ध्यान रखने के लिए
पूरी साकारात्म्कता एकाग्रता और अनुशासन के साथ अपनी योजना पर कार्य करना होगा |
ये बात ठीक है कि सभी को खुश नही किया जा सकता पर सभी को नाराज करना भी अक्लमंदी
नहीं | कुछ लोगो को भी यदि आप प्रसन्नता दे पाए तो यह आपकी उपलब्धि होगी | एक
अच्छा बॉस यही करता है ,वो अपने कर्मचारियों को हमेशा प्रोत्साहित करता है और उसे
अपनी भविष्य की योजनाओं में शामिल करता है तथा किसी भी लाभ की प्राप्ति पर उनके
साथ अपना लाभ किसी न किसी रूप में साझा करता है | सबसे पहले स्वयम में विशवास करे
और फिर दूसरों के मन में अपने प्रति विशवास और सहयोग की भावना पैदा करे | मेवा
खाने के लिए सेवा का गुण होना बहुत जरूरी है | आज के प्रति स्पर्धा से भरे बाजार
में एक प्रसिद्ध कम्पनी जब अपना न्य उत्पाद लांच करती है तो क्या वो उस उत्पाद के
प्रति लोगो में अपनी गुणवत्ता और विशवास बनाने का प्रयत्न नही करती | फिर चाहे वो
विज्ञापन के माध्यम से हो या किसी अतिरिक्त लाभ का लालच देकर किया गया प्रयास ही
क्यों न हो | ये आकर्षण का ही एक महत्वपूर्ण तत्व है | अपने प्रति और अपने कार्य
के प्रति आकर्षण पैदा करना ही आज के समय की मांग है |

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