व्यवहार में लचकता का जादू
जिन टहनियों पर फल या फूल कुछ ऊंचे लगे
होते है ,हमारा हाथ उन तक
नहीं पहुँचता ,तब हम उनकी लचकता का लाभ उठाते हुए और अपनी लचकता का प्रयोग
करते हुए उन्हें हाथ बढ़ाकर अपनी ओर झुका लेते है और फल फूल को अपनी पहुँच में ले
आते हैं । क्या ऐसा हम अपने आस पास फैले उपयोगी और सफल लोगों के साथ भी कर सकते
हैं ?महत्वपूर्ण
लचकता है । कठोरता आपको अंगूर खट्टे हैं जैसी नाकरात्मक्ता ही दे सकती है ।
डार्विन ने लिखा है कि प्रकृति में उन्हीं जातियों का अस्तित्व रहा जिन्होंने अपने
आपको हालातों के अनुकूल ढाल लिया । जो अपने को बदल न सके वे समाप्त हो गए । बदलाव
की लचकता आपको जीवन के नए आयाम देती है |
एक अध्यापक बहुत मेहनती था और उसके
नतीजे भी पिछले कई वर्षों से बहुत अच्छे जा रहे थे | एक दिन एक नया शिक्षा अधिकारी उसके
स्कूल में रूटीन चेकिंग पर आया | उसने अपने ओहदे का प्रभाव जताते हुए अध्यापकों के
पढ़ाने के ढंग की आलोचना शुरू कर दी | वः किसी कि कोई बात या ढंग से सहमत नहीं था |
अधिकारी ने अच्छे नतीजे वाले अध्यापक को
भी नहीं छोड़ा और उसकी खूब आलोचना की | उसके पढ़ाने के तौर तरीकों की कोई सराहना
नहीं की और उसे नियमों के अनुसार बने बनाये तरीको को ही इस्तेमाल करने का आदेश झाड
दिया | अध्यापक का आत्मविश्वास इस सबसे कुछ कम हुआ और वो नाकारात्मक विचारों के
साथ उस दिन रात तक परेशान हो गया | उसने
घर के लोगों के साथ भी अच्छी तरह बात नहीं की | घर में भी उसके परेशानी को
कोई नहीं समझ पाया | अगले दिन से उसके स्कूल का माहौल उसके लिए पूरी तरह बदल गया |
उसे नाकारात्मक विचारों से भरे लोगो की बाते अच्छी लगने लगी | उसने पढ़ने के अपने
नए तरीको को प्रयोग करना छोड़ दिया | उसे लगा कि यदि मेरे काम की कोई प्रशंसा ही
नहीं हो रही और मेरे काम में नुक्स निकाले जा रहे है तो मुझे भी उन लोगों के तरह
काम करना चाहिए जो अपना काम केवल किसी ख़ुशी के लिए नही बल्कि एक खाना पूर्ती के लिए करते है | वहीं एक और
अध्यापक भी काम करता था जिसके तरीके भी बड़े नए और मनोरंजक थे | उसने उस अधिकारी की
बात को बड़े ध्यान से सुना और बिना कोई तर्क किये उसका धन्यवाद किया | उसने अधिकारी
की सराहना करते हुए कहा ,”मै आपका बहुत आभारी हूँ जो आपने मुझे पढ़ने के तरीको में
सुधार करने के लिए कहा ,मै आपको यकीन दिलाता हूँ कि आपके इन बहुमूल्य सुझावों का
प्रयोग आज से ही छात्रों को पढ़ने के लिए करूंगा |” अधिकारी इससे बहुत खुश हुआ और
अध्यापक के साथ नरमी से पेश आने लगा | उस अध्यापक ने अधिकारी के जाने के बाद ऐसे
किसी तरीके का इस्तेमाल नहीं किया जो उसे अधिकारी बता कर गया था | अध्यापक के
नतीजे जिन तरीको से लम्बे समय से अच्छे नतीजे दे रहे थे ,उसने उन्ही तरीको को जारी
रखा | न तो उसने अपनी संतुष्टि गवाई और न ही अपनी ख़ुशी | वः अपने तरीको और जीवन को
लेकर साकारात्मक बना रहा |
इस कहानी का केन्द्रीय भाव यही है कि _
१.जब कोई अधिकारी आपसे सख्ती से पेश
आये और आपको आदेश दे तो कभी भी उससे बहस न करे |
२.अंहकारी व्यक्ति को प्रशंसा से ही
शांत किया जा सकता है |
३.अपनी साकारात्म्कता को बचाने के लिए
नाकारात्मक विचारों से दूर रहे |
इस तरह की परिस्थिति में अपना धैर्य और
आत्म विशवास न खोये | आप के नतीजे आपकी वास्तविक शक्ति हैं उन पर हमेशा गर्व करना
सीखे |
लोगो को सुनना सीखे | क्या करना है या
क्या नहीं करना है ये केवल आप पर निर्भर है | इस मामले में अपने चुनाव अपने तक
सीमित रखे |
इस प्रकार के लोग कभी अधिकारी के रूप
में ,कभी पडोसी के रूप में ,कभी रिश्तेदार के रूप में या सडक पर चलते घुमते किसी
अजनबी के रूप में आपको मिल सकते है | इस दुनिया में सब कुछ अच्छा नहीं है पर हमें
केवल अपनी अच्छाई और गुणवत्ता को बचाना है और इसके लिए निम्न लिखित गुण होना बहुत
जरूरी है _
१.स्वयम पर विशवास
२.बेहतर नतीजों के लिए लगातार प्रयास
३.स्वय को लेकर हमेशा साकारात्म्कता का
भाव
4.परिस्थितियों के अनुसार लचकता
५.नकारात्मक बातों को स्वयम पर हावी न
होने देना
इस संसार में बहुत से लोग ऐसे है
जिन्हें हमेशा आलोचना ही मिली है | उनकी मानसिकता आलोचना से इतनी पीड़ित है कि वे
दूसरों के साथ भी वही करना चाहते है जो उनके अपने साथ होता रहा | आलोचना और
प्रशंसा विहीन जीवन और संगत ने उनके जीवन में इतनी नकारात्मकता भर दी कि उनके जीवन
का सारा आशावाद और लचकता केवल कठोरता और निराशावाद से भर गयी है | वे उच्चरक्तचाप
,मधुमेह और न जाने कौन कौन सी बिमारियों से झूझ रहे है | आपका शरीर आपके विचारो और
सोच से प्रभावित होता है | इस बात को कई शोध सिद्ध कर चुके है | अगर आप के विचार
निराशावादी और नाकारात्मक है तो अच्छी से अच्छी दवा भी आपको ठीक नहीं कर सकती
क्योकि नकारात्मकता एक ऐसी चुम्बक है जो केवल बुरी आदतों और बुरी चीजों को अपनी और
आकर्षित करती है | ऐसे लोगो को बहुत साकारात्मक माहौल की आवश्यकता होती है ,अच्छे
मित्रों की आवश्यकता होती है ,अच्छी पुस्तके ,अच्छी संगती और एक साकारात्मक गुरु
की आवश्यकता होती है | प्रेरणा के साथ साथ उनका सम्मान और प्रशंसा ही उन्हें बदल
सकती है | इनके साथ बहस या तर्क करना अपनी मुश्किलों को बढ़ाना है |
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