Tuesday, 12 June 2018

हरियाली और स्वास्थ्य सबसे बड़ा धर्म है ।

सुबह उठते ही ताजी हवा,आस पास फैले हरे भरे पेड़ औऱ कोयल तोतों की रसभरी आवाज में लिपटी शांति प्रकृति की सबसे बड़ी नियामत है । नहाते और पीते वक्त पानी मे हमे अपना अक्स उतना ही साफ दिखता है जितना हम उसे साफ और शुद्ध रख पाए है ।  पर्यावरण की  इन सभी नियामतों के लिए शुक्रिया । आप खुद सोचिये की हमे जो इस ग्रह पर मिला है वो सब कुछ कितना कीमती है और जीवनदायी है ,क्या इनके प्रति हमें अपना कोई फर्ज नही निभाना चाहिए । सूर्य जो एक संतुलित दूरी से हमारे ग्रह को ऊर्जा देता है । जिसकी रौशनी चारो ओर फैली वनस्पति को प्रकाश संश्लेषण में मदद कर भोजन देता है और हमे विटामिन डी के तत्व जो हमारी चमड़ी और हड्डियों के लिए बहुत जरुरी है । सुबह सैर करते समय ताज़ी हवा या ऑक्सीजन जो हमारे पूरे शरीर के सिस्टम को चलायमान रखती है,कितनी बड़ी नियामत है । पेड़ पौधों से बनने वाली जड़ी बूटियां,फल और उनके द्वारा वातावरण के तापमान को संतुलित रखने में दिया जाने वाला योगदान न हो तो हमारा ग्रह बाकि ग्रहों की तरह जीवनहीन हो जाये । सूर्य हमारे पिता जैसा है जो हमें जीने की ऊर्जा देता है और पृथ्वी माँ जैसी जो हमारा भरण पोषण करती है । इनके लिए हमें आभारी और धन्यवादी होना होगा तथा इनके लिए अपने दिलों में सम्मान और देखभाल की भावना भरनी होगी । 
 अब कुछ और दृश्य भी सामने है जिनमे गली मोहल्लों में फैला प्लास्टिक कचरा ,खुले सीवरेज और नालियों से उठती बदबू और दूषित जल से फैलती बीमारियां ये सब हम मनुष्यों की देन है जो हमने प्रकृति को दी । हमने क्या के बदले क्या लौटाया, इससे हमारा चरित्र स्पष्ट होता है । अन्धधुन्ध पेड़ों की कटाई औऱ दलाली के लालच से बढ़ता नगरीकरण,कीटनाशकों का अन्धधुन्ध प्रयोग,पशुओं का दोहन करने वाले इंजेक्शन,खत्म होती पक्षी प्रजातियां ये सब हमने दिया । कोई एक वर्ग इसके लिए जिम्मेदार नही हम सब जिम्मेदार हैं । हमारा लालच और स्वार्थी मन हमें भस्मासुर बना रहा है । धार्मिक प्रवचन औऱ धार्मिक गुरु जितने हमारे देश मे हैं उतने कही नही । वेद ग्रन्थ सभी प्रकृति की महिमा गाते हैं । पर हमें बेकार और झूठी कथाएं सुनने से फुर्सत नही । धार्मिक दिखने से ज्यादा धार्मिक बनना हो तो अपने धर्म गर्न्थो को पढ़िए, उन्हें केवल माथा टेकने या रटने के लिए मत रखिये । अपने घरों में कम से कम चार पेड़ लगाइये, प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करिए, कागज का प्रयोग कम से कम कीजिये, डिजिटल साधनों का प्रयोग करें,किचन गार्डन बनाइये,कम पानी वाली फसलों और अनाज को बढ़ावा दीजिये,थोड़ी दूर जाना हो तो पैदल चलिए । आपका शरीर और आपका वातावरण सबसे बड़ा धर्म है,इसे बचाइए । आइए हम सब इस धरती के सच्चे सेवक बने । ये काम केवल हम कर सकते हैं । हमारा सबसे बड़ा धर्म उन वस्तुओं के लिए आभारी और उत्तरदायी होना है जो हमें जीवन देती है जिनके कारण हम जीवित और स्वस्थ है । ग्लोबल वार्मिंग हमारे स्वार्थ का नतीजा है । हमने केवल लेना सीखा है ,देना नही । पर अगर अपनी इस आदत को न बदला तो हम अपनी सुन्दर पृथ्वी को प्लास्टिक कचरे के ढेर से बना एक टापू बना देंगे । जिस पर सिर्फ बदबू और बीमार जीवन के अंतिम अवशेष बचेंगे । आइये पृथ्वी बचाएं ,पेड़ लगाए,पानी बचाये और एक स्वस्थ जीवन जीने का संकल्प ले । असली सम्पन्नता स्वास्थ्य है और वो धरती की हरियाली और स्वच्छता से संभव है ।

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