आप बहुत खुशकिस्मत हैं कि जिंदा और स्वस्थ हैं ।
एक बार एक आदमी अपने जीवन से निराश होकर एक साधु के पास गया । साधु ने उसकी निराश का कारण पूछा तो वह बोला,"मैं एक गरीब आदमी हूँ और अपनी गरीबी से इतना तंग आ गया हूँ कि मेरे पास जीने की कोई वजह नही है । साधु ने कहा कोई बात नही,मैं तुम्हारी गरीबी दूर कर सकता हूँ और तुम्हे बहुत से धन दे सकता हूँ पर तुम्हे इसके बदले मुझे कुछ देना पड़ेगा ।
आदमी खुश हुआ और बोला ,मैं आपको क्या दे सकता हूँ,मेरे पास आपको देने के लिए कुछ भी नही है ।"
साधु ने कहा,यदि तुम मुझे अपनी दोनों आँखे मुझे दे दो तो मैं तुम्हे दो लाख दे सकता हूँ । या अपने दोनों हाथ,पैर,मुंह,पेट कोई भी अंग ,सबकी कीमत बीस लाख रुपये दे सकता हूँ ।"
आदमी हैरान था,"वो बोला अजीब बात कर रहे है आप,हाथों के बिना मैं काम कैसे करूँगा,पैरों के बिना मैं चलूंगा कैसे,और पेट और मुंह के बगैर तो जीवन की कल्पना ही मुश्किल है ।"
साधु मुस्कुराया और बोला,"तुम तो कह रहे हो कि तुम गरीब हो जबकि तुम्हारे शरीर का हर के अंग इतना कीमती है कि तुम बड़ी कीमत पर भी इन्हें नही बेचना चाहते ।"
आदमी को बात समझ मे आ गयी और वो बोला,"मैं जान गया हूँ कि हमारा स्वस्थ शरीर हमारी सबसे बड़ी अमीरी है और इसके हर अंग के लिए मुझे परमात्मा का आभारी होना चाहिए । मैं प्रण लेता हूँ कि अपनी शारीरिक मेहनत और हिम्मत से खूब मेहनत करूँगा और कभी हिम्मत नही हारूँगा ।"
ये कहानी बताती है कि जो स्वास्थ्य का खजाना हमारे पास है उसके रहते हमे ईश्वर का धन्यवाद होना चाहिए न कि उन चीजों को लेकर निराश होने चाहिए जो हम अपने आलस या निककमेपन की वजह से प्राप्त नही कर पा रहे । स्वास्थ्य और तंदरुस्त शरीर एक ऐसी उपलब्धि है जो आपको सब कुछ करने का जोश देती है आपका शरीर आपकी सफलता की नींव है । शरीर बीमार है ,रोगी है या आप किसी भयंकर बीमारी से जूझ रहे हैं तो शहर के बड़े हस्पतालों के ए सी लगे कमरों के बिस्तर पर पड़े हुए भी आप अपने आपको दुनिया का सबसे गरीब कमजोर इंसान मानेगें ।
हिंदी और बॉलीवुड फिल्मों के शानदार अभिनेता इरफान खान हर दिल अजीज है । उनकी एक्टिंग भारतीय सिनेमा का मील पत्थर है । बदकिस्मती से पिछले कुछ दिनों से वे दिमाग के कैंसर से पीड़ित हो गए है और विदेश के एक हस्पताल में भर्ती है । आज उनके पास पैसा है,शोहरत है,जीवन की हर सुविधा है पर जीवन खतरे में है । उनका एक पत्र टाइम्स ऑफ इंडिया में छपा है जिसमे जीवन की कामना और छोटी छोटी खुशियों के लिए वो अपनी बीमारी के कारण अवसाद ग्रस्त हो गए है-
कुछ महीने पहले अचानक मुझे पता चला था कि मैं न्यूरोएंडोक्रिन कैंसर से ग्रस्त हूं। मैंने पहली बार यह शब्द सुना था। खोजने पर मैंने पाया कि इस शब्द पर बहुत ज्यादा शोध नहीं हुए हैं। क्योंकि यह एक दुर्लभ शारीरिक अवस्था का नाम है और इस वजह से इसके उपचार की अनिश्चितता ज्यादा है। अभी तक अपने सफ़र में मैं तेज़-मंद गति से चलता चला जा रहा था ... मेरे साथ मेरी योजनाएं, आकांक्षाएं, सपने और मंजिलें थीं। मैं इनमें लीन बढ़ा जा रहा था कि अचानक टीसी ने पीठ पर टैप किया, ’आप का स्टेशन आ रहा है, प्लीज उतर जाएं।’ मेरी समझ में नहीं आया... न न, मेरा स्टेशन अभी नहीं आया है...’ जवाब मिला, ‘अगले किसी भी स्टॉप पर उतरना होगा, आपका गंतव्य आ गया...’ अचानक एहसास हुआ कि आप किसी ढक्कन (कॉर्क) की तरह अनजान सागर में अप्रत्याशित लहरों पर बह रहे हैं। लहरों को क़ाबू करने की ग़लतफ़हमी लिये।
इस हड़बोंग, सहम और डर में घबरा कर मैं अपने बेटे से कहता हूं, ’आज की इस हालत में मैं केवल इतना ही चाहता हूं... मैं इस मानसिक स्थिति को हड़बड़ाहट, डर, बदहवासी की हालत में नहीं जीना चाहता। मुझे किसी भी सूरत में मेरे पैर चाहिए, जिन पर खड़ा होकर अपनी हालत को तटस्थ हो कर जी पाऊं। मैं खड़ा होना चाहता हूं।’
ऐसी मेरी मंशा थी, मेरा इरादा था...
कुछ हफ़्तों के बाद मैं एक अस्पताल में भर्ती हो गया। बेइंतहा दर्द हो रहा है। यह तो मालूम था कि दर्द होगा, लेकिन ऐसा दर्द? अब दर्द की तीव्रता समझ में आ रही है। कुछ भी काम नहीं कर रहा है। न कोई सांत्वना और न कोई दिलासा। पूरी कायनात उस दर्द के पल में सिमट आयी थी। दर्द खुदा से भी बड़ा और विशाल महसूस हुआ।
मैं जिस अस्पताल में भर्ती हूं, उसमें बालकनी भी है। बाहर का नज़ारा दिखता है। कोमा वार्ड ठीक मेरे ऊपर है। सड़क की एक तरफ मेरा अस्पताल है और दूसरी तरफ लॉर्ड्स स्टेडियम है। वहां विवियन रिचर्ड्स का मुस्कुराता पोस्टर है, मेरे बचपन के ख़्वाबों का मक्का। उसे देखने पर पहली नज़र में मुझे कोई एहसास ही नहीं हुआ। मानो वह दुनिया कभी मेरी थी ही नहीं।
मैं दर्द की गिरफ्त में हूं।
और फिर एक दिन यह एहसास हुआ... जैसे मैं किसी ऐसी चीज का हिस्सा नहीं हूं, जो निश्चित होने का दावा करे। न अस्पताल और न स्टेडियम। मेरे अंदर जो शेष था, वह वास्तव में कायनात की असीम शक्ति और बुद्धि का प्रभाव था। मेरे अस्पताल का वहां होना था। मन ने कहा, केवल अनिश्चितता ही निश्चित है।
इस एहसास ने मुझे समर्पण और भरोसे के लिए तैयार किया। अब चाहे जो भी नतीजा हो, यह चाहे जहां ले जाए, आज से आठ महीनों के बाद, या आज से चार महीनों के बाद, या फिर दो साल... चिंता दरकिनार हुई और फिर विलीन होने लगी और फिर मेरे दिमाग से जीने-मरने का हिसाब निकल गया!
पहली बार मुझे शब्द ‘आज़ादी ‘ का एहसास हुआ, सही अर्थ में! एक उपलब्धि का एहसास।
इस कायनात की करनी में मेरा विश्वास ही पूर्ण सत्य बन गया। उसके बाद लगा कि वह विश्वास मेरे हर सेल में पैठ गया। वक़्त ही बताएगा कि वह ठहरता है कि नहीं! फ़िलहाल मैं यही महसूस कर रहा हूं।
इस सफ़र में सारी दुनिया के लोग... सभी, मेरे सेहतमंद होने की दुआ कर रहे हैं, प्रार्थना कर रहे हैं, मैं जिन्हें जानता हूं और जिन्हें नहीं जानता, वे सभी अलग-अलग जगहों और टाइम ज़ोन से मेरे लिए प्रार्थना कर रहे हैं। मुझे लगता है कि उनकी प्रार्थनाएं मिल कर एक हो गयी हैं... एक बड़ी शक्ति... तीव्र जीवन धारा बन कर मेरे स्पाइन से मुझमें प्रवेश कर सिर के ऊपर कपाल से अंकुरित हो रही है।
अंकुरित होकर यह कभी कली, कभी पत्ती, कभी टहनी और कभी शाखा बन जाती है... मैं खुश होकर इन्हें देखता हूं। लोगों की सामूहिक प्रार्थना से उपजी हर टहनी, हर पत्ती, हर फूल मुझे एक नयी दुनिया दिखाती है।
एहसास होता है कि ज़रूरी नहीं कि लहरों पर ढक्कन (कॉर्क) का नियंत्रण हो... जैसे आप क़ुदरत के पालने में झूल रहे हों!"
पानी की कीमत प्यासा और भोजन की कीमत भूखा आदमी महसूस करता है । अच्छी नींद की कीमत वही जान सकता है जिसने दिन भर हाड़ तोड़ मेहनत की है और आखिर में ये सब महसूस करने के लिए आपके पास एक तंदरुस्त शरीर होना सबसे बड़ी उपलब्धि है । शरीर मे एक स्वस्थ दिमाग जो आपको सपने,विचार और उत्साह से भरपूर रखे ।
तो आइए अपने स्वस्थ शरीर के लिए अपने सौभाग्यशाली माने और इसमें प्रकृति के पंच भूतों के प्रति मिट्टी,हवा,सूर्य,पानी और परमात्मा के प्रति आभारी हो ।
धन्यवाद,धन्यवाद,धन्यवाद ।
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